द्वितीय वर्ष छात्र, भारतीय प्रबंधन संस्थान (IIM) उदयपुर
ग्रामीण विकास अक्सर आँकड़ों के जाल में उलझ कर रह जाता है। जब हम ‘डिजिटल इंडिया’ और ‘ट्रिलियन डॉलर इकोनॉमी’ की बात करते हैं, तब उदयपुर जिले के झाड़ोल खंड का क्यारिया गाँव हमें एक महत्वपूर्ण वास्तविकता से परिचित कराता है। हाल ही में एक रूरल इमर्शन प्रोग्राम के दौरान इस गाँव के सूक्ष्म अध्ययन से जो तथ्य सामने आए, वे केवल एक गाँव की कहानी नहीं हैं, बल्कि पूरे भारतीय ग्रामीण ढाँचे के लिए एक महत्वपूर्ण केस स्टडी प्रस्तुत करते हैं।
क्यारिया हमें सिखाता है कि विकास केवल सरकारी योजनाओं के ‘नामांकन’ तक सीमित नहीं है, बल्कि उनकी वास्तविक ‘सक्षमता’ और ‘निरंतरता’ में निहित है।
क्यारिया गाँव में विकास के चिह्न तो मौजूद हैं, लेकिन वे अपनी पूर्ण क्षमता में कार्य नहीं कर रहे हैं। उदाहरण के लिए, गाँव के पास एक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र है, लेकिन कर्मचारियों और दवाओं की कमी के कारण वह एक ‘खाली इमारत’ बनकर रह गया है।
परिणामस्वरूप, आधुनिक चिकित्सा के इस युग में भी ग्रामीण ‘भोपा’ जैसे पारंपरिक उपचारकर्ताओं और अंधविश्वासों पर निर्भर हैं। यहाँ प्रश्न यह उठता है कि क्या हमारा लक्ष्य केवल स्वास्थ्य केंद्रों का निर्माण करना है, या वास्तव में स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करना?
शिक्षा के क्षेत्र में भी स्थिति कुछ ऐसी ही है। गाँव में कक्षा 8 तक विद्यालय होना एक उपलब्धि अवश्य है, लेकिन उसके आगे की शिक्षा का अभाव बच्चों के लिए एक ‘डेड ट्रैप’ सिद्ध होता है। कक्षा 8 के बाद पढ़ाई छोड़ देना यहाँ सामान्य बात है, जो आगे चलकर बाल श्रम और कम उम्र में विवाह जैसी समस्याओं को जन्म देता है।
विकास की वास्तविक कसौटी यह होनी चाहिए कि क्या हम बच्चों को केवल ‘साक्षर’ बना रहे हैं, या उन्हें ‘सशक्त’ बनाकर मुख्यधारा से जोड़ रहे हैं।
ऊर्जा के क्षेत्र में भी क्यारिया एक महत्वपूर्ण सबक देता है। गाँव के लगभग 30 प्रतिशत घरों में उज्ज्वला योजना के तहत एलपीजी कनेक्शन तो उपलब्ध हैं, लेकिन अधिकांश घरों के चूल्हों से आज भी लकड़ी का धुआँ निकलता है।
यह ‘लास्ट-माइल एडॉप्शन’ की विफलता को दर्शाता है। जब तक एलपीजी रिफिल की लागत और उसकी उपलब्धता ग्रामीणों की क्रय-शक्ति के अनुरूप नहीं होगी, तब तक कागज़ी आँकड़े पर्यावरण और स्वास्थ्य दोनों के मोर्चे पर अपेक्षित बदलाव नहीं ला पाएँगे।
यह नीति-निर्माताओं के लिए स्पष्ट संकेत है कि किसी योजना का वितरण उसका अंतिम चरण नहीं, बल्कि केवल शुरुआत है।
क्यारिया की सबसे बड़ी शक्ति उसकी ‘सामाजिक पूंजी’ है, जिसे अक्सर मुख्यधारा के विकास मॉडल में नजरअंदाज कर दिया जाता है।
यह ऐसा समाज है जहाँ दहेज प्रथा का प्रभाव नगण्य है, जातिगत भेदभाव अपेक्षाकृत कम है और महिलाओं को अपने जीवनसाथी चुनने की पर्याप्त स्वतंत्रता प्राप्त है। यह सामाजिक रूप से अत्यंत प्रगतिशील ढाँचा आर्थिक विकास के लिए भी एक मजबूत आधार प्रस्तुत करता है।
यदि यहाँ के स्वयं सहायता समूहों को केवल ‘बचत समूह’ तक सीमित रखने के बजाय उन्हें आजीविका केंद्रों के रूप में विकसित किया जाए, तो यही सामाजिक प्रगतिशीलता एक व्यापक आर्थिक परिवर्तन का आधार बन सकती है।
क्यारिया का अध्ययन हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि ग्रामीण विकास के लिए अब केवल ‘टॉप-डाउन’ दृष्टिकोण पर्याप्त नहीं है। इसके स्थान पर समाधान-केंद्रित और समुदाय-आधारित दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है।
हमें बुनियादी ढाँचे के निर्माण से आगे बढ़कर सेवा-प्रदाय व्यवस्था (Service Delivery) पर ध्यान केंद्रित करना होगा। शिक्षा की खाई को पाटना, स्वास्थ्य केंद्रों को जवाबदेह बनाना तथा स्थानीय समुदायों को उनकी सामाजिक शक्तियों के आधार पर सशक्त करना ही वह मार्ग है जिससे क्यारिया जैसे हजारों गाँव आत्मनिर्भर बन सकते हैं।
विकास का पैमाना यह नहीं होना चाहिए कि कितनी योजनाएँ गाँव तक पहुँचीं, बल्कि यह होना चाहिए कि उन योजनाओं ने कितने जीवन बदले।
— रूरल इमर्शन प्रोग्राम की रिपोर्ट पर आधारित